वृन्दावन पहुँचने के लिए सबसे आसान और प्रमुख रास्ता मथुरा (Mathura) होकर जाता है, जो कि वृन्दावन से केवल 15 किमी की दूरी पर स्थित है।

आप अपनी सुविधा के अनुसार हवाई मार्ग, रेल मार्ग या सड़क मार्ग से यहाँ पहुँच सकते हैं:

यात्रा संबंधी उपयोगी जानकारी:

वृन्दावन (खाना+रहना+कार+स्कूटी+बाइक+) के लिए संपर्क कर सकते हैं

Ramkumar Agarwal 8923936983, Brahma Chaudhary 8650010972

1. रेल मार्ग द्वारा (By Train) — सबसे आसान तरीका

  • निकटतम रेलवे स्टेशन: मथुरा जंक्शन (Mathura Junction – MTJ)
  • कैसे आएँ: भारत के लगभग सभी प्रमुख शहरों (दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, जयपुर आदि) से मथुरा के लिए सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं।
  • मथुरा से वृन्दावन: मथुरा जंक्शन से बाहर निकलते ही आपको ई-रिक्शा (E-rickshaw), ऑटो (Auto), या शेयरिंग ऑटो मिल जाएँगे जो 20–30 मिनट में आपको सीधे वृन्दावन पहुँचा देते हैं।

2. सड़क मार्ग द्वारा (By Road / Bus / Car)

  • दिल्ली-एनसीआर से: दिल्ली से वृन्दावन की दूरी लगभग 160-180 किमी है। आप यमुना एक्सप्रेसवे (Yamuna Expressway) या NH-19 (पुराना NH-2) के जरिए अपनी गाड़ी या कैब से 2.5 से 3 घंटे में पहुँच सकते हैं।
  • बस द्वारा: दिल्ली (ISBT कश्मीरी गेट या सराय काले खाँ), आगरा, और जयपुर से मथुरा/वृन्दावन के लिए उत्तर प्रदेश परिवहन (UPSRTC) की सीधी बसें हर समय उपलब्ध रहती हैं। बसें आपको ‘छटीकरा मोड़’ या ‘मथुरा बस स्टैंड’ पर छोड़ती हैं, जहाँ से आगे के लिए ऑटो मिल जाते हैं।

3. हवाई मार्ग द्वारा (By Flight)

  • निकटतम एयरपोर्ट: इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (DEL), नई दिल्ली (दूरी लगभग 160 किमी)
  • दूसरा विकल्प: खेरिया हवाई अड्डा (AGR), आगरा (दूरी लगभग 70 किमी – सीमित उड़ानें)
  • एयरपोर्ट से आगे: दिल्ली एयरपोर्ट से आप सीधे वृन्दावन के लिए प्राइवेट कैब बुक कर सकते हैं या फिर नई दिल्ली/हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन जाकर मथुरा के लिए ट्रेन पकड़ सकते हैं।

वृन्दावन शहर के अंदर यात्रा कैसे करें?

वृन्दावन के अंदर संकरी गलियाँ होने के कारण बड़ी गाड़ियाँ (कारें) मुख्य मंदिरों तक नहीं जा पातीं। शहर के भीतर घूमने के लिए ई-रिक्शा (E-Rickshaw) सबसे सुविधाजनक और सस्ता साधन है।

वृंदावन में दोपहर के समय (12:00 PM से 4:00 PM) मुख्य मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं, इसलिए समय का सही प्रबंधन बहुत आवश्यक है।

श्री बांके बिहारी जी मंदिर, वृन्दावन

अपनी यात्रा की शुरुआत वृंदावन के सबसे प्रसिद्ध और श्रद्धा के केंद्र बांके बिहारी मंदिर से करें। सुबह 8:00 बजे तक यहाँ पहुँचना सही रहता है ताकि भीड़ नियंत्रित रहे।

  • मुख्य आकर्षण: बाल रूप में विराजमान श्री बांके बिहारी जी के दर्शन और यहाँ की पर्दा प्रथा।

  • सावधान : तंग गलियों में चश्मे और मोबाइल का ध्यान रखें (बंदरों का प्रभाव रहता है)
  • और पास की दुकानों पर कचौड़ी-सब्ज़ी व कुल्हड़ वाली लस्सी का स्वाद लें।

स्वरूप और नाम का अर्थ: “बांके” का अर्थ है ‘तीन जगहों से मुड़ा हुआ’ (त्रिभंग मुद्रा—गर्दन, कमर और घुटने से झुके हुए) और “बिहारी” का अर्थ है ‘आनंद लेने वाला’।

प्रकट होने की कथा: मान्यता है कि स्वामी हरिदास जी (संगीताचार्य और तानसेन के गुरु) की भक्ति और भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर श्री राधा-कृष्ण ने एक रूप होकर संवत 1599 (1542 ईस्वी) में निधिवन में अवतार लिया था। वही स्वरूप श्री बांके बिहारी जी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पर्दे की परंपरा: बांके बिहारी मंदिर में निरंतर दर्शन के बजाय बीच-बीच में पर्दा लगाया और हटाया जाता है। मान्यता है कि यदि कोई भक्त बिहारी जी की आँखों में लगातार देख ले, तो बिहारी जी उसके प्रेम के वश में होकर उसके साथ ही चले जाते हैं।

आरती की परंपरा: बांके बिहारी मंदिर में सुबह मंगला आरती नहीं होती (केवल वर्ष में एक बार जन्माष्टमी पर होती है)। माना जाता है कि ठाकुर जी रात भर रासलीला करके देर से सोते हैं, इसलिए उन्हें सुबह ज़बरदस्ती जगाया नहीं जाता।

श्री राधा बल्लभ जी

श्री राधा वल्लभ जी, वृन्दावन का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्राचीन संप्रदाय तथा मंदिर है। इस संप्रदाय की स्थापना श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी ने 16वीं शताब्दी (समवत 1591) में की थी।

सावधान : तंग गलियों में चश्मे और मोबाइल का ध्यान रखें (बंदरों का प्रभाव रहता है)

बांके बिहारी जी के दर्शन के बाद श्री राधा बल्लभ जी के दर्शन करते हैं

दर्शन मंत्र / जयकारा: “श्री राधा वल्लभ श्री हरिवंश, श्री वृंदावन श्री बनचंद्र।”

राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति: राधा वल्लभ संप्रदाय में ‘रस उपासना’ (प्रेम भक्ति) का विशेष महत्व है। यहाँ श्री राधा रानी को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, और भगवान श्री कृष्ण उनके आधीन होकर ही उनकी सेवा करते हैं।

विग्रह (मूर्ति) का स्वरूप: राधा वल्लभ जी के मंदिर में मुख्य विग्रह श्री कृष्ण (राधा वल्लभ जी) का है। इस मंदिर में राधा रानी का कोई अलग विग्रह या मूर्ति नहीं है; उनके स्थान पर श्री राधा रानी की गद्दी (पीढ़) विराजमान रहती है, जिससे यह संदेश मिलता है कि श्री राधा और श्री कृष्ण एक ही हैं।

संस्थापक – श्री हित हरिवंश महाप्रभु: हित हरिवंश महाप्रभु जी को श्री राधा जी की वंशी (वेणु) का अवतार माना जाता है। उन्होंने ‘राधा सुधानिधि’ और ‘हित चौरासी’ जैसे प्रसिद्ध पदों की रचना की।

सेवा-पूजा पद्धति: यहाँ भगवान की अष्टयाम सेवा (दिन में आठ बार) बहुत भाव और स्नेह के साथ की जाती है। उत्सवों, ऋतु-सेवा (जैसे समाज गायन, झूलनोत्सव, सांझी सेवा) और दिव्य व्यंजनों के भोग के लिए यह मंदिर प्रसिद्ध है।

मंदिर: वृंदावन का मूल पुराना राधा वल्लभ मंदिर लाल बलुआ पत्थर का एक बेहतरीन स्थापत्य कला (Architecture) का उदाहरण है, जो मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में बना था। वर्तमान में नया मंदिर इसके पास स्थित है जहाँ नित्य दर्शन और सेवा होती है।

श्री राधा रमण जी

श्री राधा रमण जी, वृन्दावन के प्राचीन और अत्यधिक प्रतिष्ठित ‘सप्त देवालयों’ (सात प्रमुख मंदिरों) में से एक हैं। इस मंदिर की स्थापना श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी ने 16वीं शताब्दी (सन 1542) में की थी।

राधा बल्लभ जी के दर्शन के बाद राधा रमण जी के दर्शन करें

जयकारा: “श्री राधा रमण लाल की जय!”

स्वयंभू विग्रह (मूर्ति): राधा रमण जी का विग्रह किसी मूर्तिकार द्वारा तराशा नहीं गया है। मान्यता है कि श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर, उनके पास मौजूद शालिग्राम शिलाओं में से ‘दामोदर शालिग्राम’ स्वतः ही श्री कृष्ण के अत्यंत सुंदर द्विभुज (दो हाथों वाले) त्रिभंगी रूप में प्रकट हो गए थे।

राधा रानी की उपस्थिति: राधा वल्लभ जी की तरह यहाँ भी श्री राधा रानी का कोई पृथक विग्रह नहीं है। राधा रमण जी के बाएं भाग में श्री राधा रानी के नाम का ‘गोमती चक्र’ और उनका एक पवित्र मुकुट रखा रहता है, जो उनकी दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है।

अखंड अग्नि (500+ वर्षों से): मंदिर की रसोई में पिछले 480 से अधिक वर्षों से एक पवित्र अग्नि बिना बुझे लगातार जल रही है। इसी अग्नि का उपयोग भगवान के ‘महाप्रसाद’ (भोग) को पकाने के लिए किया जाता है।

अष्टयाम सेवा और राग-भोग: यहाँ वैष्णव परंपरा के अनुसार अति सूक्ष्म और भावपूर्ण अष्टयाम सेवा (दिन में आठ बार) की जाती है। उत्सवों पर संगीत, समाज-गायन और शास्त्रीय कलाओं के माध्यम से भगवान का सुहावना श्रृंगार और सेवा की जाती है।

गौड़ीय संप्रदाय से संबंध: श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी चैतन्य महाप्रभु के षड्-गोस्वामियों (छह प्रमुख गोस्वामियों) में से एक थे। इसलिए यह मंदिर गौड़ीय वैष्णव परंपरा का प्रमुख केंद्र है।

निधिवन

निधिवन, वृन्दावन का एक अत्यंत रहस्यमयी और पवित्र धार्मिक स्थल है। यह स्थान भगवान श्री कृष्ण, श्री राधा रानी और गोपियों की दिव्य रासलीला से गहराई से जुड़ा हुआ है।

दर्शन का समय प्रातः 7 बजे से सायं 5 बजे तक (सभी मंदिरों के कपाट बंद होने के बाद दोपहर में निधिवन घुमने का अच्छा समय है ।

तुलसी के अद्भुत वृक्ष (वनशील): निधिवन के पेड़ बहुत ही अनोखे हैं। यहाँ के वृक्ष सीधे ऊपर की ओर न बढ़कर नीचे की ओर मुड़े हुए हैं और एक-दूसरे में उलझे हुए प्रतीत होते हैं।

मान्यता है कि ये वृक्ष वास्तव में गोपियाँ हैं, जो रात्रि के समय प्रकट होकर भगवान श्री कृष्ण और राधा जी के साथ रासलीला में भाग लेती हैं।

रात्रि कालीन रासलीला का रहस्य: संध्या आरती के बाद (सूरज ढलने पर) निधिवन के सभी द्वार बंद कर दिए जाते हैं। यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी शाम को यह वन छोड़ कर चले जाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि आज भी हर रात श्री कृष्ण और राधा रानी यहाँ रासलीला करने आते हैं। यदि कोई रात के समय यहाँ रुकने का प्रयास करता है, तो वह देखने, सुनने या बताने की स्थिति में नहीं रहता।

रंग महल: निधिवन के भीतर स्थित ‘रंग महल’ में हर शाम श्री राधा रानी के श्रृंगार का सामान, चंदन, नीम की दातुन, पान के पत्ते और पीने के लिए जल रखा जाता है।

सुबह जब महल के कपाट खोले जाते हैं, तो सारा सामान बिखरा हुआ और इस्तेमाल किया हुआ मिलता है।

स्वामी हरिदास जी की साधना स्थली: निधिवन वही परम पावन स्थल है जहाँ संगीत सम्राट एवं संत स्वामी हरिदास जी (तानसेन के गुरु) ने अपनी कठोर साधना की थी। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर ही बांके बिहारी जी का विग्रह (मूर्ति) यहाँ प्रकट हुआ था।

ललिता कुण्ड: वन परिसर में ‘ललिता कुण्ड’ स्थित है। माना जाता है कि जब रासलीला के दौरान सखी ललिता जी को प्यास लगी थी, तब श्री कृष्ण ने अपनी बंसी से इस कुण्ड का निर्माण किया था।

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चारों धामों का एक जगह दर्शन: सनातन धर्म में भारत के चार कोनों में स्थित चार धामों की यात्रा का बहुत महत्व माना गया है। इस मंदिर परिसर में इन चारों धामों के मुख्य विग्रहों और स्थापत्य (Architecture) की सुंदर प्रतिकृतियाँ बनाई गई हैं।

माँ वैष्णो देवी की विशाल प्रतिमा: इस मंदिर परिसर में माँ वैष्णो देवी की एक अत्यंत विशाल और भव्य प्रतिमा (लगभग 141 फीट ऊँची) स्थापित है, जो दूर से ही दिखाई देती है और पर्यटकों व श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र है।

गुफा और झरना: जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर यहाँ एक कृत्रिम गुफा (Gufa) और सुंदर जलप्रपात बनाया गया है, जिससे होकर श्रद्धालु दर्शन के लिए जाते हैं।

द्वादश ज्योतिर्लिंग: यहाँ भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के स्वरूपों के दर्शन भी एक ही स्थान पर करने को मिलते हैं।